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Rita Singh, 'Sarjana'


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अच्छी सोच जिंदगी में सचमुच खुशिया भर देती है

Posted On: 29 Jan, 2010  
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“देश से मामा बड़ा नहीं” (लेख )

Posted On: 24 Nov, 2016  
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पीड़ा (कविता)

Posted On: 16 Nov, 2016  
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हाइकु

Posted On: 14 Nov, 2016  
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मैं उड़ना चाहती हूँ (कविता)

Posted On: 5 Nov, 2016  
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एक सा दर्द (कविता)

Posted On: 4 Feb, 2016  
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सुबह की प्रतीक्षा (कविता)

Posted On: 28 Jan, 2016  
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दायरे (कविता)

Posted On: 11 Dec, 2015  
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बदलाव (कविता)

Posted On: 6 Sep, 2015  
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कविता

Posted On: 24 Apr, 2015  
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वात्सल्य (कविता)

Posted On: 2 Jan, 2015  
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13 Comments

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

के द्वारा: Jitendra Mathur Jitendra Mathur

Ну вот как и общал даю БµÂ´Ã‘€ÐÂÃс:-ул.Центральнаð 27(стааарая хибарка).Кошкам на сутки нужно»:1. Пакет сухого корма»ÃÂºÃÂ¸Ã‘‚и-кет»ÃÂ·ÃÂ° -48р.2.1 литр ряженки 55р.(кефир никак)Если найдутся добрые люди,могу у них забирать сухой корм.Только лучше если сразу на несколько суток,а то тяжело ходить.

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रीता जी ,मुझे तो पूरी उम्मीद थी कि उस दिन हम सब एक साथ मिलेंगें पर मिलना नहीं हो पाया कोई बात नहीं हो सकता है आगे भविष्य में कभी मिलना हो मिलने के अवसर फिर आएंगे....जे जे मंच के सभी साथियों व आप सबसे प्यार ,सद्भावना और सम्मान मिला वह शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता केवल महसूस किया जा सकता है यहाँ शब्द भी कम पड़ जाते हैं क्योंकि प्रिय दिव्या से जब मिली मुझे ऐसा लगा कि मैं जैसे मैं अपनी बेटी से से मिल रही हूँ दिव्या और उसकी दोनों बहनों से कितना प्यार व सम्मान मिला नहीं बता सकती हम लोगों को लगा ही नहीं पहली बार मिल रहे हैं कितना अपनत्त्व था वहाँ ... मिलने के अवसर की प्रतीक्षा है रीताजी ...

के द्वारा: alkargupta1 alkargupta1

रीता जी निश्चित रूप से आप[के साथ भेंट मेरे लिए कल्पनातीत थी.कहाँ आसाम और कहाँ पश्चिमी उत्तरप्रदेश का एक जिला मुज़फ्फरनगर .आपकी इच्छाशक्ति,स्नेह के बल पर ही आपसे मिलना सम्भव हुआ.गत वर्ष भी जब आपका सम्मान हुआ था जालंधर में तब भी ये प्रोग्राम बना था परन्तु दुर्भाग्य से भेंट न हो सकी.. भले ही समय बहुत कम था आप लोगों के पास लंच आदि का भी समय न था,मेरी हार्दिक इच्छा थी कि आप लोगों को मुज़फ्फरनगर की प्रसिद्ध चाट अवश्य खिला सकूँ,परन्तु न हो सका .चलिए उन पलों को रोक तो नहीं सकते थे,पर सदा स्मृति में बसे रहेंगें ,पुनः आपसे मिलने का कुछ समय साथ रहने का अवसर मिलेगा.ऐसी आशा है.आपको मेरी शुभकामनाएं और आभार

के द्वारा: nishamittal nishamittal

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के द्वारा: सौरभ मिश्र सौरभ मिश्र

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के द्वारा: Bhagwan Babu 'Shajar' Bhagwan Babu 'Shajar'

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रद्धा का हाथ यकायक रुक गया l उसने इडली को पुन: प्लेट में वापस रख दिया l फिर वह धीरे-धीरे उस बच्ची के करीब गई l किसी की आने की आहट सुनकर बच्ची ने पलटकर देखा l हाय राम! कितनी प्यारी बच्ची हैं l श्रद्धा चौक उठी l परन्तु किस्मत की मारी बेबस उस गरीब बच्ची के लिए क्या अच्छा खाना क्या खराब फर्क करने के लिए कहाँ समय था l उसे तो बस जिन्दा रहने के लिए पेट भरने से मतलब था l गरीबी की भूख ने उसे आज गन्दगी भरी जुट्ठन और खाने के बीच का फर्क भी भुला दिया था l बच्ची को देखकर श्रद्धा का मन भर आया l उसने बच्ची अपने पास बुलाया फिर इडली का प्लेट उसके हाथ में थमाकर वह ट्रेन की तरफ चल पड़ी …जहाँ ट्रेन छूटने का सिग्नल हो चुका था ल कम शब्दों में बहुत भावपूर्ण प्रस्तुति दी है आपने ! बहुत बढ़िया

के द्वारा: yogi sarswat yogi sarswat

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बहूत ही सुन्दर चित्रण बधाई, आज मै एक ऐसी रचना लेकर आप सब के सामने उपस्थित हुआ हूँ, जिसे पढ़कर आप सब की आँखे नाम हो जायेगी. और यही हमारे देश की कड़वी सच्चाई भी है, इस कविता के माध्यम से मै ऋषभ शुक्ला, इस समाज का निर्दयी ही सही लेकिन है तो सच. आज हमारे समाज के लोग महिलाओ के प्रती वही पुरानी सोच रखते है जो वह हमेशा रखते आये है, और आगे भी ऐसी ही सोच रखने का इरादा है. गरीब माँ-बाप अपनी बेटियों को बोझ समझते है और वह संतान के रूप में एक बेटा चाहते है, और इसके लिए वह गर्भ में ही जाच के द्वारा उन्हें यदी पता चल गया की गर्भ में बच्ची है तो उसे इस दुनिया में आने से पहले ही मार देते है, उस नन्ही सी जान को जो इस निर्मम दुनिया में आने को बेताब रहती है, उसकी सभी इच्छाओ को भी मार देते है . मै इस कविता के माध्यम से उस छोटी गुडिया के दर्द को आप सब से मुखातिब करने का प्रयत्न कर रहा हूँ. कृपया मेरी गुजारिश है की आप सब इस लिंक को देखे और उसके बारे में कम से कम दो शब्द कहे. यदी कमेंट देने में कोई असुविधा हो तो उसे लाइक करे या वोट करे. http://rushabhshukla.jagranjunction.com/?p=25 शुक्रिया

के द्वारा: ऋषभ शुक्ला ऋषभ शुक्ला

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रीता जी, भावनात्मक रूप से मनुष्य दो रिश्तों से ही अधिक जुड़ा होता है । एक वह, जिससे वह पैदा होता है, तथा दूसरा वह, जिसे वह खुद पैदा करता है । रिश्तों की इस सच्चाई के बावज़ूद पहला वाला रिश्ता आज के परिवेश में उम्र के एक पड़ाव के बाद भावनात्मक रूप से काफ़ी कमज़ोर पड़कर टूटन की स्थिति में इसलिये पहुँच जा रहा है, क्योंकि कई कारणों से हमारे अंदर की मतलब-परस्ती अब खुद हम पर ही हाबी हो चुकी है । इस मतलब-परस्त माहौल में हर वह वस्तु, चाहे हमारे अपने माता-पिता ही क्यों न हों, यदि हमारे लिये फ़ायदेमन्द नहीं रही, तो फ़िर हम उसका बोझ ढोने के लिये तैयार नहीं हैं । आप और हम इस बदलाव को चाहें तो हर स्तर पर महसूस कर सकते हैं । कोई निर्जीव वस्तु भी जो हमें प्यारी होती थी, हम ता-उम्र उसे सहेज कर रखने में आत्म-संतुष्टि महसूस करते थे, परन्तु आज मिनटों में बेचकर पैसे खाली कर लेना अधिक प्यारा लगता है । पैसा और भौतिक उपभोग की वस्तुओं के अतिरिक्त आज हमें कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा । जिसे पैदा किया है, वह तो स्वाभाविक रूप से हमारे लिये उम्र भर काम आने वाली 'वस्तु' है, अत: उसके प्रति हमारे प्यार में कोई कमी नहीं आती । जब उसका प्यार उसी चक्र के अनुसार हमारे प्रति कम होने लगेगा, तब तीनों त्रिलोक का हमें दर्शन होना अवश्यम्भावी है । परन्तु अफ़सोस कि हम अपनी पूर्व करनी को भूल कर अपनी संतान को ही कोसने की परम्परा को कायम रखेंगे, जैसा कि आज हमारे माँ-बाप कर रहे हैं ।

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के द्वारा: जैनित कुमार वर्मा जैनित कुमार वर्मा

के द्वारा: जैनित कुमार वर्मा जैनित कुमार वर्मा

के द्वारा: Rita Singh, 'Sarjana' Rita Singh, 'Sarjana'

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रीता जी, प्रणाम! पूरी कहानी पढी, वेदना के साथ संवेदना खान चाचा . प्रेमचंद आज भी जिन्दा हैं आप जैसे लोगों की कहानियों मे! मेरा मानना है की दंगे भड़काने वाले दुसरे लोग होते हैं जो दूर से बैठकर तमाशा देखते हैं ... कोई रिमोट बम छोड़ देते हैं हत्या हमेशा मासूमों की होती है. कोई तो बताये किसी नेता का खून हुआ हो किसी भे साम्प्रदायिक दंगे में. सभी धर्मगुरु केवल उकसाने का काम करते हैं और अपनी दूकान चलाते हैं. खान चचा, रहमत मिया, जुम्मन शेख हमेशा से थे और रहेंगे कल मैंने देखा टी वी पर मनमोहन सिंह जी को शाहनवाज हुसैन के घर शरबत पीते हुए ... अच्छा लगा . हमें सीख लेने की जरूरत है इनसे ये आपस में नहीं भिड़ते .. राजनीतिक बयान बाजी इनकी मजबूरी है.

के द्वारा: jlsingh jlsingh

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आदरणीय रीता, सादर नमस्कार। पूर्णतः  सहमत हूँ आपसे। मेरा  मानना है कि 15 अगस्त 1947 को काँग्रेस और अंग्रेजों के मध्य सत्ता के हस्तान्तरण का समझौता हुथा था। अंग्रेजों ने यह समझौता अपनी शर्तों पर किया था। काँग्रेसी नेताओं का सत्ता सुख भोगने की जल्दी थी। अतः आनन फानन में समझौता कर लिया गया। अंग्रेज नहीं चाहते थे कि दुनियाँ में यह संदेश जाये कि भारतीयों ने अंग्रेजों से अपनी आजादी छीनी है। अतः उन्होंने काँग्रेस के हाथों में भारत की सत्ता सौपी। क्योंकि वे अंग्रेजों की शर्त मानने का राजी थे। इलहावाद के अलफ्रेड पार्क में शहीद चन्द्रशेखर आजाद को घेरने वाले कोतवाल को उत्तर प्रदेश के पुलिस कमान सौपना उन्ही शर्तों में से एक शर्त थी। इस संबंध में आप स्वर्गीय राजीव दीक्षित जी के आलेख पाढ़िये या उनके भाषण सुनिये। मेरा मानना है कि यह आधी अधूरी आजादी थी, यदि सच कहा जाये तो काँग्रेस और अंग्रेजों के मध्य सत्ता हस्तान्तरण का एक समझौता था। फिर भी आधी अधूरी आजादी की मुबारकबाद……

के द्वारा: dineshaastik dineshaastik

rita ji,sadr प्रणाम |आपसे शिकवा हैं की कभी हमारे ब्लॉग पर नही आती हैं | ************************************* ये आज़ादी का कैसा त्यौहार! हर तरफ है भूख, गरीबी और अत्याचार!! आम आदमी की उम्मीद घट रही है...बढ़ रही है तो सिर्फ महगाई, रोष और भ्रष्टाचार!!! जिनके पास न रोटी है . न वस्त्र , न शिक्षा है , न छत , उनसे क्या पूछिए , क्या है स्वतन्त्रता दिवस , स्वतंत्रता दिवस तो मनमोहन को लिखा है , जो लालकिले पर तिरंगा फहराएंगे या कि प्रणव मुखर्जी जिनकी लाटरी लगी है ........... पिंजड़े में बंद परिंदों को वास्ता क्या ? इन झमेलों से, चमन में कब खिजां आई , चमन में कब बहार आई। भूखे प्यासे , शोषितों को जिनक ी मिहनत - मजदूरी के पैसे . लूट लिए पटवारी ने , वे बेचारे , जनतंत्र -तिरंगा क्या जानें ?

के द्वारा: अजय यादव अजय यादव

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माफ़ कीजियेगा योगेश जी , बोड़ोभूमि में वर्तमान एक ही जिला हैं जिसे कोकराझार डिस्ट्रिक्ट कहते हैं l जहां बोडो के साथ -साथ अलग-अलग जनजाति के लोग वर्षो से रह रहे हैं l दंगे से सभी लोग प्रभावित हैं ,लेकिन अपनी संस्कृति बचाने के लिए उत्तेजित होने की कोई आवश्यकता नहीं योगेश जी , इसके लिए यहाँ सभी लोग प्रयासरत हैं जितना उत्तेजित होंगे उतना बात बिगड़ेगी l मैं समझती हूँ कभी भी इंसान को ऐसी बाते नहीं कहनी चाहिए जिससे साम्प्रदायिक भावनाओ को ठेस पहुंचे l हम भारतीय हैं इस भावना को कम होने नहीं देना चाहिये l संस्कृति बचाने के लिए आप जिस तरह आह्वान कर रहे हैं आप ही आकर कुछ करके दिखाइये न हमें ख़ुशी होगी l वहां बैठ कर बाते कहना और उत्तेजक भीड़ के हाथो हथियार से लेस और गुस्सा से मुकाबला करना दो अलग-अलग बात हैं l रही ४ महीने बोंगाईगाँव में रहने की तो उस समय की परिस्थिति और अभी में बहुत फर्क हैं भाई l

के द्वारा: Rita Singh, 'Sarjana' Rita Singh, 'Sarjana'

रीता जी ...आपके पुराने ब्लॉग से मुझे मालूम है की आप असम से सम्बन्ध रखती है ..मैं ज्यादा समय तो नहीं मगर ४ महीने के लिए बोंगाई गाँव में रहा करता था ..वहां से मैंने कई सारे बोडो जिलों में घूमा करता था .... मुझे मालूम है कि बोडो लोग कैसे होते है. मुझे पता है आसामी कैसे होते हैं .. और ये दुनिया को मालूम है कि ये मुस्लिम कैसे होते हैं.. सोचने कि बात है... ये जातीय हिंसा नहीं है ..ये अपने वर्चस्व कि लड़ाई है ... बोडो का अस्तित्व खतरे में है... और सोचने वाली बात है क्या केवल बोडो का अस्तित्व खतरें में है ???? ...बाकि किसी को कोई फरक नहीं पड़ता??? लोग अपने बच्चों, से बहुत प्यार करते है..आने वाली पीढ़ी के लिए बहुत कुछ समेटते हैं... मगर क्या आने वाली पीढ़ी सुरक्षित है ..क्या संस्कृति सुरक्षित है???? इतिहास को सामने को रखकर सोचना होगा..

के द्वारा: yogeshkumar yogeshkumar

महोदया, असम के प्रति आपने अपनी सवेंदना, अपनी तड़प, अपना डर और अपना दर्द अपने ब्लॉग में छाप दिया.. ये अच्छी बात है आपके अन्दर सवेंदना असम के प्रति ... वास्तव में आपने भी केवल प्रश्न खड़े किये है अपने ब्लॉग में..डिप्लोमेटिक प्रश्न... कि ..क्यों हो रहा है ऐसा ?..और आपने भी बस यही लिखा है कि शांति होनी चाहिए.. मगर आपने भी गहन मनोवैज्ञानिक विश्लेषण नहीं किया.. आपने तथ्य नहीं देखे.. ना ऐतिहासिक तथ्य, ना वर्तमान के तथ्य ..न ना ग्लोबल तथ्य ... सोचने कि जरूरत है हर किसी को इन बातों पर ..संभव है लोग डर रहे हैं.. सच बात लिखते हुए .या सच बात बोलते हुए.. मगर क्यों ये बात समझ नहीं आ रही ... सही को सही और गलत को गलत बोलना होगा .... जरूरी नहीं हर बार तारीफ़ करनी हो.. ये गलत होते समय चुप हो जाना हो.... ज़रा सोचिये !!!!!!!

के द्वारा: yogeshkumar yogeshkumar

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आदरणीय  रीता जी, ऐतिहासिक  एवं दार्शनिक  दृष्टि से यह स्थान  महत्वपूर्ण  हो सकता है। किसी कवि द्वारा कल्पित  की गई कहानी बहुत  ही सुन्दर  मिथक  है। मानव द्वारा रचित  इस  तरह  के मिथक  आपको भी धर्मों के ग्रंथों में मिल  जायेंगी। जो मानव  की सोच  का प्रतिबंधित  करती हैं। प्रत्येक   कहानी सुन्दर संदेश  देने के लिये होती थी। अंधानुकरण  के लिये नहीं। किसी भी धर्म  का ईश्वर यदि चमत्कार दिखाता है, तो वह केवल  जादूगर  हो सकता है, ईश्वर नहीं। ईश्वर  तो सच  क्या है वह  बताता है हमें। माँ  पर चढाया गये सफेद  कपड़े का लाल  होना, माँ  का चमत्कार नहीं है, अपितु  पोपो की पोप  लीला है। इस  तरह  की पोप  लीलाओ   का महर्षि  दयानंद सरस्वति जी ने  भंडाफोड़ा था, लेकिन  इन  पोपों ने संगठित  होकर एक  षडयंत्र  रचकर उन्हें जहर  पान  करा दिया और दोष  षडयंत्र  के तहत   एक  वेश्या पर मढ़  दिया।

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दीदी नमस्कार आप तो हमेशा से अच्छा लिखती है इसलिए लिखने की क्या प्रशंशा करू. और ऐसे भी मुझे साहित्य का बहुत ज्यादा ज्ञान तो है नहीं ह पर इतना जरुर लगता है की लेखनी वही अच्छी होती है जहा लेखक की लेखनी को पढ़ कर पढ़ने वाला हमेसा एसा महसूस करे की शयद वो भी इस कथा का एक पात्र है या फिर पूरी कहानी उसकी ही तो है. आपके लेख को पढते हुआ अन्यास ही जाने कितनी बार ऐसा एहसास हुआ है. और मुझे बड़ी खुशी होती है अपने इस मंच से जुडाव की. क्यूंकि मेरे साधारण कविताओ पर कोई कमेन्ट मिले न मिले चाहे मेरा ब्लॉग देखा जाये या फिर नहीं देखा जाये पर इस मंच ने मुझे बहुत कुछ दिया है. मैं इसके लिए आभारी हूँ इस मंच का. मुझे इस मंच ने आप जैसी गुनी जनों को जानने का अवसर दिया. मैं अक्सर सोचता था की मेरे जन्म दिन पर किसी सेलिब्रिटी के जन्म दिन क्यूँ नहीं होता पर आपको जानने के बाद ये शिकायत भी दूर हो गयी क्यूंकि आप भले ही सेलिब्रिटी न हो पर जीवन के हर पल को आपने पूरी जिंदादिली के साथ सलिब्रे़ट किया है और आपकी लेखनी भी पढ़ने वालो को यही सन्देश देती है. आप ने उपर मेरे लिए जो लिखा उसके लिए मैं आपको धन्यवाद बिलकुल भी नहीं कहूँगा क्यूंकि मुझे लगता है की ये मेरा अधिकार है की मेरे बड़ी बहन मेरे लिए कुछ कहे. उपर पहले पाराग्राफ में जब मेरा नाम नहीं आया तो बड़ा निराश हो गया था मै. सोचा तुरत दीदी को फोन करके ये शिकायत करू की आप मुझे ही भूल गयी पर जब पूरा आलेख पढ़ा तो ये लगा की ऐसा हो ही नहीं सकता की आप मुझे भूल जाये. बस यूँ ही अपना स्नेह मुझ पर बनाये रखिये और यूँ ही लिखते रहिये. शुभकामनाओ के साथ .........विशाल .

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